मां तुझे सलाम: आज से 20 साल पहले कारगिल में पति हुए थे शहीद, आज बेटे को भी बनाया सेना में अफसर

भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य में आज से 20 वर्ष पहले भारतीय सेना ने 26 जुलाई, 1999 के ही दिन नियंत्रण रेखा से लगी कारगिल  की पहाड़ियों पर कब्ज़ा जमाए आतंकियों और उनके वेश में घुस आए पाकिस्तानी सैनिकों को मार भगाया था। पाकिस्तान के ख़िलाफ़ यह पूरा युद्ध ही था, जिसमें पांच सौ से ज़्यादा भारतीय जवान शहीद हुए थे। इन वीर और जाबांज जवानों को पूरा देश ’26 जुलाई’  के दिन याद करता है और श्रद्धापूर्वक नमन करता है। देश की इस जीत में कारगिल के स्थायी नागरिकों ने भी बड़ी भूमिका निभाई थी।

इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर भारतीय सिपाही तिरंगे  के समक्ष लेता है। इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था। वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्र ध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था।

 

बीते दिनों भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून से पास आउट छात्रों में ऐसे भी बच्चे शामिल है जो कि शहीद जवानों के घरों से है। जिन्होंने बचपन में अपने पिता को खो दिया और उनकी मां ने बेटों की खातिर संघर्ष किया। इसके बाद भी अपने बच्चों को देश की सेवा के खातिर तैयार किया और अब वह समय आ भी गया कि बेटा देश की सेवा के लिए तैयार हो गया।

बच्चों की खातिर किए गए संघर्ष के बीच से ही निकलकर आई खुशी। बेटों के कंधे लगे स्टार को देखकर मां का सिर ऊंचा हो गया। कारगिल की ही लड़ाई में शहीद हुए बीएसएफ के डिप्टी कमांडेंट सुभाष शर्मा की पत्नी बबीता शर्मा की भी कहानी कुछ ऐसी ही है। शहीद कमांडेंट की पत्नी की संघर्षों की कहानी इस समय सोशल मीडिया पर छाई हुई है। आंतकियों से लोहा लेते हुए 16 जनवरी 1996 को कमांडेंट शहीद हो गए थे। 6 जनवरी 1996 को आतंकी जब जम्मू-कश्मीर के रास्ते देश में घुसने की फिराक में थे, तो बीएसएफ के डिप्टी कमांडेंट सुभाष शर्मा उन्हें रोकने के दौरान शहीद हो गए, लेकिन उनके मंसूबे कामयाब नहीं होने दिए।

उनकी वीरता राष्ट्रपति ने पुलिस पदक शौर्य चक्र से सम्मानित किया था। जिस समय सुभाष शर्मा शहीद हुए थे उस समय उनका बेटा क्षितिज शर्मा महज 9 माह का था। पति की मौत के बाद अपने बच्चे को उन्होंने पाला और अपने बच्चे को भी सेना में भेजने का निर्णय लिया।  तब से लेकर अब तक 22 वर्ष बीत गए, बबीता जी की आंखों में उनका कमिटमेंट हर पल जीवित रहा।

पति के शहीद होने पर किया गया उनका प्रण कुछ दिनों पहले तब साकार हो गया जब उनका 22 वर्षीय बेटा क्षितिज ने साकार किया। पिता की बहादुरी और देशभक्ति की कहानियां सुनकर जब क्षितिज बढ़ा हुआ तो 8वीं क्लास में ही उसने अपनी मां से सेना में जाने की इच्छा जताई। आखिरकार वह सपना साकार भी हुआ और क्षितिज ने 5 लाख अभ्यर्थियों के बीच में देश में 13वां स्थान हासिल किया। परेड पासआउट करने के बाद रविवार को वो सेना में लेफ्टिनेंट बनकर कोटा लौटा।

उनकी मां बताती है कि नेशनल डिफेंस एकेडमी की तीन वर्षों की पढ़ाई और आईएमए (इंडियन मिलिट्री एकेडमी) की एक वर्ष की ट्रेनिंग पूरी कर क्षितिज अब देश की सेवा को तत्पर है। आईएमए में क्षितिज मिस्टर आईएमए व बीसीए (बटालियन कैडेट एडजुटेंट) भी रहा है। क्षितिज एमबीए की डिग्री भी हासिल कर चुका है। क्षितिज आर्मी में बेस्ट बास्केटबॉल टीम कैप्टन भी रहा है। जुलाई माह में पटियाला में अपनी पहली पोस्टिंग लेफ्टिनेंट के रूप में लेगा।