इन 6 कामों से होती है उम्र कम, महाभारत में महानितिकार विदूर ने बताई थी ये बाते

इसमें कोई दो राय नहीं कि आज के समय में साइंस इतनी तरक्की कर चुका है कि हमारी हर एक समस्या का समाधान उसके पास है। विज्ञान ने हमें वह सब कुछ दिया है जिससे हम अपनी ज़िंदगी को आसान बना सकते है लेकिन हम इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते कि आधुनिक विज्ञान से सदियों पहले लिखे गए धार्मिक ग्रंथों ने भी हमें जानकारी का एक बड़ा खजाना दिया है। एक ऐसा खजाना जो कभी ना खत्म होने वाला है, जिसे कोई पूर्ण रूप से पढ़ ले तो वह कभी किसी दुविधा में शायद ही उलझेगा। कहते हैं इन धर्म शास्त्रों के जरिये इंसान की उम्र का अंदाज़ा भी लगाया जा सकता है। धर्म ग्रंथों के मुताबिक मनुष्य की आयु 100 साल निश्चित की गई है, हालांकि आज कल कोई भी मनुष्य अपनी पूर्ण आयु जी नहीं पाता, बहुत कम ही लोग ऐसे होते हैं, जो 100 साल या उससे ज्यादा जीते हैं।

महाभारत ग्रंथ

हिन्दू धर्म ग्रंथों में से एक है महाभारत, जिसके ‘अनुशासन पर्व’ में ऐसी कई गतिविधियां शामिल की गई थीं, जिसके अनुसार एक व्यक्ति की आयु किन कारणों से बढ़ती या घटती है, यह बताया गया है। जी हां, आप जो भी करेंगे, जैसा व्यवहार करेंगे उसका आपकी उम्र पर खासा फर्क पड़ता है। महाभारत ग्रंथ के अनुसार वे लोग जो ‘धर्म’ के उसूलों का उल्लंघन करते हैं तथा धार्मिक मर्यादाओं की निंदा करते हैं, ऐसे लोगों की आयु कम होती जाती है।महाभारत में भी एक प्रसंग है, जब राजा धृतराष्ट्र महात्मा विदुर से इंसानों की उम्र घटने को लेकर सवाल पूछते हैं, तो विदुर ने उम्र कम होने के 6 दोषों के बारे में धृतराष्ट्र को बताया।

अभिमान और ज्यादा बोलने वाला

पद का अहंकार, अपनी प्रशंसा सुनने वाला, खुद को बलवान, बुद्धिमान, त्यागी और महात्मा समझने वाला अभिमान का शिकार हो जाते हैं,  अभिमानी श्रेष्ठ को भी हीन समझता है और उसकी बातें नहीं मानता, अभिमानियों के कई अभिमानी श्रेष्ठ को भी हीन समझता है और उसकी बातें नहीं मानता, अभिमानियों के कई शत्रु हो जाते हैं, इसके साथ ही जो इंसान ज्यादा या व्यर्थ की बातें करता है, वो सत्य का पूरी तरह से पालन नहीं करता है, कई बार ऐसी बातें भी कर बैठता है, जिनका परिणाम बुरा होता है, ऐसे लोग बुद्धिमानों को प्रिय नहीं होते और दूसरे लोगों पर उसकी बातों का प्रभाव भी नहीं होता। असंयमित वाणी से उम्र कम होती है।

गुस्सा और त्याग का अभाव

इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन गुस्सा है, गुस्से में इंसान अपने कर्मो के परिणाम को भूल जाता है, जिससे उसका पतन होने लगता है।  सांसारिक सुख इंसान की आयु त्याग का अभाव होने की वजह से ही रावण, दुर्योधन का पतन हुआ। सांसारिक सुख इंसान की आयु को काटते हैं। इंसान को जीवन में सदैव ध्यान रखना चाहिये, कि हम इस संसार में कुछ लेने नहीं बल्कि दूसरों को सुख देने के लिये आए हैं।

स्वार्थ और मित्रद्रोही

स्वार्थ यानी की लोभ ही अधर्म का मूल कारण है, स्वार्थी इंसान अपना काम साधने के लिये बड़े से बड़ा पाप करने में भी शर्म महसूस नहीं करते, वर्तमान परिदृश्य में देखा जाए, तो स्वार्थ की वजह से ही दुनिया में पाप कर्म बढ रहे हैं। मित्रद्रोही पुरुषों को अधम कहा जाता है, पतन की ओर जाते हुए कई पुरुषों का उत्थान मित्रों ने किया है, मित्रद्रोही मनुष्य का जीवन नरक के समान होता है।