एक पिता का अपने बच्चो के लिए ऐसा त्याग, जो आपकी भी आंखें नम कर देंगी

माता-पिता की छाया में ही जीवन सँवरता है। माता-पिता, जो निःस्वार्थ भावना की मूर्ति हैं, वे संतान को ममता, त्याग, परोपकार, स्नेह, जीवन जीने की कला सिखाते हैं। बच्चों की खुशियों के लिए उनके माता-पिता तो कुछ भी करने को तैयार हो सकते हैं और करते भी हैं|इस बात का एक बड़ा उदाहरण प्रस्तुत किया है लाहौर के इस कुली पिता ने. इनके संघर्ष की कहानी किसी भी पिता के लिए प्रेरणा का एक और नया घरौंदा बना सकती है. सुनना चाहेंगे आप भी दिल को छू लेने वाली इनकी कहानी तो फिर आइये शुरू करते है |

पिता हमारे जीवन में बहुत महत्व रखते हैं पिता न होते तो शायद हमारा कोई अस्तित्व ही न होता| पिता बिना किसी लोभ के अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी मेहनत करते है ताकि उनका बच्चा पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बने और उनका नाम गर्व से ऊँचा हो|हर हाल में माता पिता चाहते हैं की हमारे बच्चे को किसी भी प्रकार का दुःख न देखना पड़े|

इसी तरह का एक उदहारण हमें लाहौर के रेलवे स्टेशन में ऐसे व्यक्ति के पास देखने को मिला।सबसे पहले आपको परिचय देते हैं लाहौर के इस पिता का जिनका  नाम है यूसिफ  दरअसल लाहौर के ही सलीम काज़मी ने अपने फ़ेसबुक पेज पर एक ट्रिप के दौरान किसी कुली के साथ हुई छोटी सी मुलाकात का किस्सा शेयर किया है जो काफी असहाय होने के बाद भी अपने बच्चो की जिंदगी सँवारने के लिए लोगों के बोझ से दबा जा रहा था।

लाहौर के रेलवे स्टेशन में करीब 20 सालों से काम कर रहे यूसिफ नामक व्यक्ति ने अपने बच्चों के खातिर यहां पर कुली की नौकरी की। और दिनरात की कड़ी मेहनत करके बच्चों की खुशियों के आगे अपनी खुशियों को भी न्योछावर कर दिया। परिवार में एक बेटा और 2 बेटीयों की जिम्मेदारी को उन्होनें बाखूबी निभाया। उन्होनें दिन-रात मेहनत करके लोगों को बोझ उठाकर बच्चे को इंजीनियरिंग की शिक्षा पूरी करायी।

साल 2008 में यूसिफ़ के बेटे ने जिस कॉलेज से इंजीनियरिंग की थी, उसे उसी कॉलेज में लेक्चरार की जॉब मिल गयी। बेटे की नौकरी लगते ही मानों उनके सपने पूरे हो गए। बेटे की जॉब से पूरा परिवार ख़ुश था, बेटे ने नौकरी पाने के बाद पिता की नौकरी छुड़वा दी। लेकिन यूसिफ़ की किस्मत खुशियों से काफी दूर थी। नौकरी पाने के कुछ समय के बाद यूसिफ़ के इकलौते बेटे का एक्सीडेंट हो गया। और उन्होनें अपने इकलौते बेटे को भी खो दिया।

जवान और इकलौते बेटे की मौत के बाद यूसिफ़ का पूरा परिवार बिखर चुका था। यूसिफ़ ने अपने परिवार को फिर दोबारा संभालने के लिये जिस बेटे की आस में उन्होंने कुली की नौकरी छोड़ दी थी) अब उसे दोबारा करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प बचा ही नही था।अब वो दोबारा कुली की नौकरी पाने के लिये लाहौर के रेलवे स्टेशन पर वापस आ गए। लेकिन इस बार उनके कंधें भी समान को बोझ नही उठा पा रहे थे। क्योकि उनका एक कंधा पैरालाइज़ हो चुका है। जिससे समान को उठाने में हाथ पैर कांपने लगते थे। लेकिन इसके बावजूद उनका दूसरा उद्देश्य़ अपनी दोनों बेटीयों को काबिल बनाने का था। जिसके लिये वो इन बोझ क सामने भी हार मानने के तैयार नही थे।