13 लाख टन कचरे के ढेर को 300 करोड़ रुपए में बदल दिया इस IAS ऑफिसर ने, जाने कैसे?

दोस्तों कुछ सालो पहले देश के पीएम नरेंद्र मोदी ने एक बड़ी ही अच्छी मुहीम शुरू की थी जिसका नाम हैं ‘स्वच्छ भारत अभियान’. इस मुहीम के चलते पुरे देश में लोग अपने आसपास की स्वच्छता को लेकर जागरूक हुए थे. इस काम में आम लोगो से लेकर बड़े बड़े सेलिब्रिटीज तक सभी ने रूचि दिखाई थी. इसके बाद हर शहर को क्लीन बनाने और इस काम के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने एक बड़ी ही दिलचस्प प्रतियोगिता भी शुरू कर दी. इसमें होता ये हैं कि हर साल स्वच्छ भारत अभियान के तहत देश के सभी शहरों को उनकी स्वच्छता के अनुसार रेंकिंग दी जाती हैं. ऐसे में हर साल शहर वाले और वहां का नगर निगम डिपार्टमेंट इस रेंक में ऊपर आने के लिए जी जान लगाकर अपने शहर को स्वच्छ बनाने कोशिश करता हैं.

इसी कड़ी में मध्यप्रदेश का इंदौर शहर लगातार पिछले दो वर्षों से नंबर 1 आ रहा हैं. इंदौर वासियों ने अपने शहर को स्वच्छ बनाने के लिए और ये नंबर 1 की रैंक हासिल करने के लिए खूब पसीना बहाया हैं. इंदौर शहर के इस स्वच्छता अभियान की मुख्य डोर IAS ऑफिसर आशीष सिंह के हाथो में थी. आशीष इंदौर मुंसीपल कमिश्नर भी हैं. वे पीएम मोदी के स्वच्छ भारत अभियान से काफी प्रेरित हुए और उन्होंने हर हाल में अपने शहर इंदौर को साफ़ सुथरा बनाने की ठान ली.

पिछले कुछ सालो से इंदौर शहर के हर गली मोहल्ले का कचरा वहां से साफ़ करवा कर एक जगह एकत्रित किया जा रहा था. ऐसे में ये कचरा बढ़ते बढ़ते 13 लाख टन के ढेर में परिवर्तित हो गया. इस कचरे के ढेर ने शहर की एक बहुत बड़ी जमीन रोक रखी थी और ये सफाई की दृष्टि से भी अच्छा नहीं दिखाई दे रहा था. ऐसे में आशीष ने इस कचरे के ढेर को साफ़ करने का मन बना लिया. लेकिन ये उनके लिए इतना आसान भी नहीं था. यदि आशीष बाहर से कोई एक्स्ट्रा मदद बुलाते तो इस काम के लिए उन्हें 65 करोड़ रुपए तक खर्च करने पड़ जाते. लेकिन इतना अधिक बजट ना होने के कारण आशीष ने लोकर सोर्स से ही मदद ली और थोड़ी जुगाड़ लगाते हुए इस कचरे के ढेर को साफ़ करवा दिया.

13 लाख टन के इस कचरे को साफ़ करवाने में उन्हें और उनकी टीम को पुरे 6 महीने लग गए. इन 6 महीनो में उनकी टीम ने दिन रात काम किया. इसके लिए पहले उन्होंने गिले और सूखे कचरे को अलग करने का काम किया. इसके लिए मशीन की सहायता ली गई. कचरे में जितना भी लोहा, कागज़ जैसा सामान था उसे जंक डीलर (लोहा भंगार वाले) को बेच दिया गया. कचरे के प्लास्टिक को इधन में परिवर्तित कर लिया गया. कचरे में निकले फ़ालतू के रबड़ जैसे पदार्थो को पिघला के बुलिडिंग निर्माण का मटेरियल बनाया गया. वहीँ पोलीथिन जैसे कचरों का इस्तेमाल सीमेंट प्लांट्स और रोड निर्माण में किया गया. इस तरह धीरे धीरे आशीष और उनकी टीम ने सारे कचरे को ठिकाने लगा दिया.

इस कचरे को हटाने का सबसे बड़ा फायदा ये भी हुआ कि उन्हें एक बहुत बड़ी 100 एकड़ की खाली जमीन मिल गई जो अब तक इस कचरे के ढेर ने रोक रखी थी. अब इस नई जमीन का उपयोग सिटी फारेस्ट बनाने के लिए किया जाएगा. साथ ही इसमें गोल्फ कोर्स और अन्य सुविधाएं भी ऐड की जाएगी.

आपकी जानकारी के लिए बता दे कि इस कचरे के ढेर को हटा के जो 100 एकड़ की जमीन मिली हैं उसकी कीमत 300 करोड़ से भी ज्यादा हैं. इसके साथ ही कचरे को रिसाइकल करने या बेचने से जो मुनाफा हुआ वो अलग. इस तरह इस IAS ऑफिसर ने सरकार को कचरे के ढेर के बदले कई करोड़ का फायदा करवा दिया और शहर भी साफ़ सुथरा हो गया.

इस IAS ऑफिसर की सोच और जजबे को हमारा सलाम.