अगर आप भी खाते हैं तेरहवीं का मृत्यु भोज, तो जान लें इसके पिछे का ये कटु सत्य

इस दुनिया में जन्म लेने वाले हर एक व्यक्ति की मृत्यु होना निश्चित हैं और इस कटु सत्य से हर कोई वाकिफ हैं| लेकिन इसके बाद होने वाले  तेरहवीं का नाम तो आपने कई बार सुना होगा और पता भी होगा की जब कोई इंसान दुनिया छोड़ देता है तो उसके मरने के तेरह दिन बाद मृत्युभोज होता है| इतना ही नहीं कई बार जब ये बात हमारे सामने आती है तो हम खाना तो खा आते हैं पर क्या आपको पता है ये खाना क्यों हो रहा है|

दरअसल हिन्दू धर्म में किसी की मृत्यु होने पर उसके मृत शरीर का दाह-संस्कार किया जाता हैं और दाह-संस्कार के बाद एक तेरहवी के भोज का आयोजन भी किया जाता हैं| इसमें आस-पास के लोग इकठ्ठा होते हैं और भोजन ग्रहण करते हैं और ऐसा प्रायः भारत के हर हिस्से में किया जाता हैं| तेरहवीं के नाम पर आज लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं जबकि पुराने समय में यह केवल राजा-महाराजाओं और सक्षम लोगों के द्वारा प्रजा के लिए किया जाता था| अब हर आदमी स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगा है| इसके पीछे रहस्य यह था कि मृतक के दुनिया से चले जाने के बाद भी उसके संबंधियों का घर से नाता बना रहे| परिवार व रिश्तेदार एकजुट रहें| आज हमने ये सब रीति सोच को बदल के रख दिया है|

लेकिन क्या ऐसा करना सही हैं या नहीं आज हम आपको महाभारत में वर्णित एक कहानी के माध्यम से बताते हैं और इस कहानी को भगवान कृष्ण ने सुनाया था| महाभारत के युद्ध के बारे में आप सभी जानते हैं कि इस युद्ध की शुरुआत और अंत कैसे हुयी| इतना ही नहीं महाभारत के युद्ध में कौन-कौन लोग शामिल थे, इस बारे में भी आपको मालूम हैं| दरअसल महाभारत के युद्ध को टालने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के सामने अंतिम बार संधि का प्रस्ताव रखा लेकिन दुर्योधन ने श्री कृष्ण के संधि प्रस्ताव को ठुकरा दिया| दुर्योधन के संधि प्रस्ताव ठुकराने के बाद जब श्री कृष्ण वहाँ से लौटने लगे तो दुर्योधन ने भगवान श्री कृष्ण से आग्रह किया कि वासुदेव भोजन ग्रहण करके जाए|

दुर्योधन के इस प्रस्ताव पर भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि भोजन ग्रहण करना तभी उचित होता हैं जब भोजन कराने वाला और भोजन करने वाला, दोनों का हृदय प्रसन्न रहता हैं| ऐसे में यदि इन दोनों मे से किसी एक का भी हृदय प्रसन्न ना हो तो फिर भोजन करना कदापि उचित नहीं होता हैं| दरअसल महाभारत के युद्ध से कोई भी प्रसन्न नहीं था और भगवान कृष्ण होने वाले इस युद्ध के छती के बारे में जानते थे|

इसलिए उन्होने ने दुर्योधन के सामने संधि का प्रस्ताव रखा था ताकि युद्ध टल जाए लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका| ऐसे में तेरहवी का भोजन करना भी उचित नहीं होता हैं क्योंकि जिस घर में मृत्युभोज कराया जाता हैं उस घर के सदस्यों का मन दुखी होता हैं और ऐसे मे यदि आप भोजन ग्रहण करते हैं तो आपका पेट जरूर भर जाएगा लेकिन मन को कभी भी शांति नहीं मिलती हैं|

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