स्त्रियों के संबंध में तुलसीदास ने बताई थी 5 सबसे गोपनीय बातें, जरूर जान लें

हिंदी साहित्य में महाकवि तुलसीदास का युग सदा अमर रहेगा। वे भक्तकवि शिरोमणि थे। तुलसी ने लोकसंग्रह के लिए सगुण उपासना का मार्ग चुना और रामभक्ति के निरूपण को अपने साहित्य का उद्देश्य बनाया। तुलसीदास का भक्तिमार्ग वेदशास्त्र पर आधारित है। कवि के रूप में उन्होंने अपने साहित्य में श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्चन, वेदन, दास्य, साख्य और आत्मनिवेदन इन सभी पक्षों का प्रतिपादन बड़ी ही कुशलतापूर्वक किया है।

जैसा की हम सभी जानते है की स्त्रियों के बारे में जानना असान काम नहीं है,लेकिन तुलसीदास जी ने इनके बारे में गहन अध्ययन करके ऐसी 5 बाते बतायी है जो की सत्य साबित हुयी है इन 5 बातो के बारे में हम आपको नीचे बता रहे है…

 

तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर न सुन्दर।
केकिही पेखु बचन सुधा सम असन अहि।।

अर्थ : इस दोहे के माध्यम से तुलसीदास बताना चाहते है की  इस दुनिया में इश्वर ने स्त्री को बहुत ही सुंदर बनाया है और उसमे इतनी शक्ति होती है की वो अपने सुन्दरता के बल पर किसी  को भी हरा सकती है और सुन्दर नारियो को देख कर  मुर्ख लोग ही नहीं बल्कि चालाक मनुष्य भी धोखा खा जाता है, सुन्दर मोर को ही देख लीजिये उसकी बोली तो बहुत मीठी है लेकिन वह सांप का सेवन करती है, इसका मतलब सुन्दरता के पीछे नहीं भागना चाहिए।

धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी।
आपद काल परखिए चारी।।

अर्थ :अपने इस दोहे के माध्यम से तुलसीदास जी ये बताना चाहते है की धीरज, धर्म, मित्र और पत्नी की परीक्षा अति विपत्ति के समय ही की जा सकती है क्योंकि अक्सर ऐसा देखा गया है की  इंसान के अच्छे समय में तो उसका हर कोई साथ देता है, लेकिन जो व्यक्ति आपके  बुरे समय में आपके साथ रहे वही आपका सच्चा साथी है। उसी के ऊपर आपको सबसे अधिक भरोसा करना चाहिए।

जननी सम जानहिं पर नारी।
तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।

अर्थ :इस दोहे के माध्यम से तुलसीदास जी बताना चाहते है की जो पुरुष अपनी पत्नी के अलावा किसी और स्त्री को अपनी माँ सामान समझता है, उसी के ह्रदय में भगवान का निवास स्थान होता है। जो पुरुष दूसरी औरतों के साथ सम्बन्ध बनाते हैं वह पापी होते हैं, उनसे ईश्वर हमेशा दूर रहता है और उस घर में कभी सुख शांति का वास नहीं हो पाता |

मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना।
नारी सिखावन करसि काना।।

अर्थ : इस दोहे के माध्यम से तुलसीदास जी बता रहे है की हमे कभी भी घमंड में आकर कोई फैसला नहीं लेना चाहिए और वे इसके लिए उदहारण देते है की भगवान राम सुग्रीव के बड़े भाई बाली के सामने स्त्री के सम्मान का आदर करते हुए कहते हैं, दुष्ट बाली तुम तो अज्ञान पुरुष हो ही लेकिन तुमने अपने घमंड में आकर अपनी विद्वान् पत्नी की बात नहीं मानी और तुम हार गए। मतलब अगर कोई आपको अच्छी बात कह रहा है तो अपने अभिमान को त्याग कर उसे सुनना चाहिए, क्या पता उससे आपका फायदा ही हो जाए।

सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।

अर्थ : इस दोहे के माध्यम से तुलसीदास जी कहते हैं कि मंत्री, वैद्य और गुरु ये तीन लोग अगर दर से या अपने फायदे के लिए किसी से प्रिय बोलते हैं तो राज्य, शरीर और धर्म इन तीनों का जल्दी ही विनाश हो जाता है। यानि उनका जो कर्म है उसे पूरी इमानदारी से करना चाहिए ना कि अपने फायदे के लिए।